राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में बाड़मेर ज़िले के कपूरड़ी की यह तस्वीर सिर्फ एक गाय की दुर्दशा नहीं है, बल्कि विकास के उन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिनकी गूंज सरकारी मंचों और नीतिगत घोषणाओं में लगातार सुनाई देती है। यह गाय बीमारी से नहीं, बल्कि भूख और चारे के अभाव में जिंदगी की जंग हारती नजर आ रही है। हैरानी की बात यह है कि यह तस्वीर उस इलाके की है, जहां की जमीन से लिग्नाइट कोयला निकालकर बिजली पैदा की जा रही है। एक तरफ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रेगिस्तान की धरती का दोहन हो रहा है, दूसरी तरफ उसी धरती पर एक बेजुबान पशु के लिए चारा और पानी का संकट दिखाई दे रहा
कपूरड़ी और जालिपा की लिग्नाइट खदानें बाड़मेर के औद्योगिक और ऊर्जा क्षेत्र की महत्वपूर्ण परियोजनाएं हैं। इन खदानों का संचालन Barmer Lignite Mining Company Limited (BLMCL) के माध्यम से होता है। इसमें राजस्थान सरकार के उपक्रम Rajasthan State Mines and Minerals Limited (RSMML) की 51 प्रतिशत और JSW Energy की सहयोगी कंपनी Raj WestPower Limited की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है। JSW Energy की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार बाड़मेर स्थित बिजली संयंत्र की उत्पादन क्षमता 1,080 मेगावाट है। यह संयंत्र स्थानीय खदानों से मिलने वाले लिग्नाइट पर निर्भर है। वहीं JSW समूह की South West Mining Limited कपूरड़ी और जालिपा की दोनों खदानों में खनन कार्य संचालित करती है। कंपनी के अनुसार इनकी संयुक्त उत्पादन क्षमता 60 लाख टन प्रतिवर्ष है।  BLMCL के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार परियोजना के लिए 41 हजार से अधिक बीघा जमीन अधिग्रहित की गई है और परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1,800 करोड़ रुपये बताई गई थी।  यानी इस क्षेत्र की जमीन, खनिज और ऊर्जा उत्पादन का आर्थिक महत्व बहुत बड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि इस आर्थिक गतिविधि का लाभ आसपास के गांवों और पशुपालकों के जीवन में कितना दिखाई देता है? पशुधन, चरागाह और आजीविका पर संकट पश्चिमी राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ पशुपालन रहा है। यहां गाय, भेड़, बकरी और ऊंट केवल पशु नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का आधार हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार पशुधन में भारी कमी आई है। चारे और पानी की उपलब्धता लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। चरागाहों और जमीन से जुड़े सवाल भी ग्रामीणों के सामने हैं। जब पशुपालक अपने पशुओं को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हों, तब इस तरह की तस्वीरें पूरे क्षेत्र की परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। खनन से विकास हुआ, लेकिन स्थानीय लोगों को कितना मिला? विकास का अर्थ केवल जमीन से कोयला निकालना, बिजली बनाना और औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना नहीं हो सकता। विकास का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि जिस क्षेत्र से संसाधन निकल रहे हैं, वहां के लोगों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पेयजल, बिजली और आजीविका की सुरक्षा कितनी मिली। स्थानीय ग्रामीणों की शिकायतों के अनुसार विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और रोजगार के सीमित अवसर आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों के सामने भी सवाल हैं। क्या उन्हें पर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास मिला? क्या स्थानीय युवाओं को परियोजनाओं में रोजगार के पर्याप्त अवसर मिले? क्या पशुपालकों की आजीविका और चरागाहों के संरक्षण के लिए प्रभावी व्यवस्था की गई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। भाजपा सरकार और प्रशासन से सीधे सवाल आज राजस्थान में भाजपा की सरकार है। ऐसे में कपूरड़ी और आसपास के क्षेत्र की समस्याओं को लेकर वर्तमान सरकार और संबंधित प्रशासन की जवाबदेही तय होना जरूरी है। गाय के नाम पर राजनीति और गौ-संरक्षण की बातें करने वाले राजनीतिक नेतृत्व के सामने भी यह तस्वीर एक सवाल खड़ा करती है। क्या गौ-संरक्षण केवल भाषणों, नारों और राजनीतिक आयोजनों तक सीमित रहेगा, या चारे-पानी के अभाव में संघर्ष कर रहे गौवंश के लिए भी ठोस व्यवस्था होगी? क्या खनन से होने वाली आर्थिक गतिविधियों के साथ स्थानीय सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों की भी नियमित समीक्षा होगी? क्या प्रभावित परिवारों, किसानों और पशुपालकों की समस्याओं के समाधान के लिए कोई स्पष्ट कार्ययोजना है? सरकार को चाहिए कि खनन क्षेत्र के आसपास के गांवों की स्वतंत्र समीक्षा कराए। पशुधन संरक्षण, चारा-पानी, चरागाह, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय रोजगार और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास पर ठोस कदम उठाए जाएं। आखिर यह कैसा विकास? जिस धरती के नीचे लिग्नाइट का खजाना है, उसी धरती के ऊपर रहने वाले लोगों और बेजुबान पशुओं का जीवन भी उतना ही मूल्यवान है। कपूरड़ी की यह तस्वीर सिर्फ एक गाय की नहीं है। यह उस विकास मॉडल से जवाब मांगती तस्वीर है, जिसमें जमीन के नीचे मौजूद संपदा का आर्थिक मूल्य तो पहचाना जा रहा है, लेकिन जमीन के ऊपर संघर्ष कर रही जिंदगी के सवाल अब भी बाकी हैं। सवाल सीधा है—कपूरड़ी की धरती से निकलने वाली संपदा से बिजलीघर रोशन हो रहे हैं, उद्योग चल रहे हैं, लेकिन यहां के गांवों, पशुपालकों और बेजुबान पशुओं के जीवन में रोशनी कब पहुंचेगी? जमीन के नीचे लिग्नाइट का खजाना, जमीन के ऊपर भूख से बेहाल जिंदगी... आखिर यह कैसा विकास?




