मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बहुत कम कार्यरत न्यायाधीशों के पास मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 के तहत आने वाले आवेदनों से निपटने की विशेषज्ञता है। उनका मानना है कि हर तीन महीने में एक न्यायाधीश से दूसरे न्यायाधीश को मध्यस्थता संबंधी प्रभार सौंपने से त्वरित न्याय सुनिश्चित करने में मदद नहीं मिल सकती।
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